भगवान परब्रह्म और श्रीकृष्ण द्वारा गीता का ज्ञान

परब्रह्म क्या है? वास्तविक स्वरूप को समझें!


भारतीय दर्शन में "परब्रह्म" एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है "अधिकतम सत्य" या "असामान्य ब्रह्म"। परब्रह्म एक ऐसा अद्वितीय तत्व है, जो सृष्टि के सभी रूपों का मूल है और अनंत, अविनाशी तथा अमर है। इसे सर्वव्यापी, निराकार और निराकार रूप में समझा जाता है। शास्त्रों में इसे अक्सर परब्रह्म या ईश्वर के रूप में भी चित्रित किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण, जो कि विष्णु का अवतार माने जाते हैं, ने गीता के माध्यम से मानवता को गहरी आत्मज्ञान और ध्यान की विद्या दी। महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जब अर्जुन अपने धर्म और कर्तव्यों के प्रति संदेह में थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश दिया। गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक मार्गदर्शन भी है।

क्या श्रीकृष्ण ही परब्रह्म के रूप थे? 

जी नहीं,गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने परब्रह्म की अवधारणा को स्पष्ट किया। गीता का ज्ञान देते समय पारब्रह्म काल का रूप धारण करके श्री कृष्ण के अंदर समा गए जिससे ब्रह्मांड में समय चक्र रुक गया। इस क्षण को "काल का समावेश" के रूप में देखा जाता है, जहां ज्ञान और दिव्यता का संयोग होता है। यह बात खुद श्री कृष्ण ने अर्जुन से कही जब अर्जुन बाद में श्री कृष्ण से पूछते हैं। है! माधव जो बात आपने उस समय कही वो दुबारा बता सकते हो तो श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन ये तो मुझे भी खुद पता नहीं है उस समय मेने क्या कहा। मे तो बस एक माध्यम था। उन्होंने कहा कि आत्मा (क्षेत्र) और परमात्मा (परब्रह्म) एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। आत्मा का सबसे बड़ा उद्देश्य अपने अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त करना और परमात्मा के साथ एकता स्थापित करना है। जब उन्होंने गीता का उपदेश दिया, तब वे सम्पूर्ण तत्त्व को प्रकट कर रहे थे। इस समय में, श्रीकृष्ण का ज्ञान केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि यह समग्रता में आत्मा और  सृष्टि की सच्चाई को दर्शाता था। इस प्रकार, जब श्री कृष्ण गीता में ज्ञान का प्रवाह कर रहे थे, तब यह केवल एक शिक्षण कार्य नहीं था, बल्कि यह एक विद्या का प्रसार था, जिसमें वे समय और अस्तित्व के पार, एक अद्वितीय शाश्वत वास्तविकता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जिसके स्रोत भगवान परब्रह्म थे।

क्या भगवान एक ही है?


हिंदू धर्म में, भगवान श्री कृष्ण, शिव और ब्रह्मा को अलग-अलग रूपों और कार्यों के रूप में देखा जाता है, लेकिन अंत में सभी को एक ही परम तत्व या परब्रह्म के अंश माना जाता है। यह विचार अद्वैत वेदांत में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है, जहाँ यह कहा गया है कि सृष्टि के सभी रूप और कथित देवता वास्तव में एक ही आत्मा या परमब्रह्म के विभिन्न रूप हैं। कहते है कि बिना शक्ति के शिव शव के समान है। शिव की शक्ति का स्रोत ओम है जो परमब्रह्म का मंत्र है। ओम परमब्रह्म एक मंत्र है जिसमें सारी शक्ति समाहित है। भगवान श्री कृष्ण, शिव और ब्रह्मा परब्रह्म से ही उत्पन हुए हैं। एकता में विविधता: परब्रह्म एक अद्वितीय वास्तविकता है, लेकिन वह अपने स्वरूपों के रूप में अनेकता में व्यक्त होता है। जैसे जीवन में विभिन्न रूप हैं, लेकिन सभी का स्रोत एक ही है। भगवान का स्वरूप और उसकी शक्तियाँ अनन्त हैं। इसलिए, हर देवी-देवता के भीतर उसी परब्रह्म का अंश है, जो विभिन्न रूपों में प्रकट होता है।
इस प्रकार, हिंदू दर्शन में यह सिखाया गया है कि सभी रूपों और नामों में एकता है, और सच्ची समझ तब प्राप्त होती है जब हम इस एकता को पहचानते हैं। यह एक गहन और विस्तृत अवधारणा है, जो हमें एकता की भावना और सृष्टि के सभी तत्वों के बीच की सामंजस्यता को समझने में मदद करती है। 

ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है? 

ज्ञान की प्राप्ति केवल सोचने, समझने और संवाद करने तक ही सीमित नहीं होती। यह एक गहन अनुभव है, जिसमें व्यक्ति काल और स्थान के बंधनों से परे जाता है। यह एक आध्यात्मिक जागरूकता की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को समझता है और उस अद्वितीय परब्रह्म की अनुभूति करता है। 

गीता में कहे गए महत्वपूर्ण संदेश 

  • श्रीकृष्ण ने गीता में विभिन्न योगों का वर्णन किया है, जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग, जो मानव को आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं। ये सभी योग हैं जो हमें हमारे मन और आत्मा को समझने और आत्मा के शाश्वत सत्य की ओर ले जाने में मदद करते हैं।
  • एक महत्वपूर्ण संदेश जो गीता में दिया गया है, वह है "कर्म करो, फल की इच्छा मत करो", जिससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का पूर्णता से निर्वहन करना चाहिए, जबकि परिणामों की चिंता नहीं करनी चाहिए। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ